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राम को मापते ओछे पैमाने...........

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यहाँ राम के विचारों का कुछ मूल्य हो न हो , ठेकेदारों (नेताओं ,धार्मिक लोगों )ने इसे एक विषय बनाके अवश्य रख छोड़ा है | भारत में राम को मापा ही जाता रहता है, कभी राजनीति के पैमाने पर तो कभी धर्म के पैमाने पर, कभी रामजादे तो कभी हरामजादे |
राम के ऐतहासिक चरित परिमापित किये जाने वाले, नित्यलीला के असली और जन-जन में अभिव्याप्त उदेश्य को भूलकर ऐतिहासिक लक्ष्यसिद्धियों में भटकने लगे |
हिन्दू धर्म एक जीवंत उच्छ्वास है और राम कोई पुरावृत नहीं है, वे हैं और वर्तमान ही रहेंगे | इतिहास में एक ऐसा समय भी आया जब रामा स्वामी नायकर के चेले कागज़ी राम पर चप्पले बरसाते हुए जुलूस निकालते हैं ,कई बार
अस्तित्व पे प्रश्नचिन्ह भी लगे परन्तु राम कुछ चित्रों, कुछ मूर्तियों, कुछ स्मारकों व कृतियों तक ही तो सीमित नहीं जो उनका अपमान हो जाये | जिसके अन्दर भावना है वह राम का अपमान नहीं कर सकता और जिसके भीतर भावना नहीं
उसके हाँथ में आएंगे बस कागज़ के चंद टुकड़े कुछ निर्जीव सी मूर्तियाँ और कुछ बिना जुबान की किताबें |
” राम कोई रचना नहीं, इतिहास नहीं, कल्पना नहीं, वह तो रचना की प्रक्रिया, कल्पना की छटपटाहट , और इतिहास की बदलती हुई व्यवस्था है |”
मैं कहती हूँ राम के भक्तों से अगर राम की पूजा करनी है तो, विचारों की पूजा क्यों नहीं मुर्तिमात्र की पूजा क्यों ,पर इस समय  मूर्ति मोह का खंडन करने वाला मुर्ख ही तो समझा जायेगा | सच्चा सनातन धर्म विगत के प्रति मोह नहीं रखता,
वह तो आगत -अनागत से परे है |ये ज्योतिषियों से राशिफल देखने वालों, चंडी जपने वालों , चित्रों को दीवार पर टांग कर प्रदर्शनी करने वालो को राम कभी  समझ न आयेंगे क्योंकि राम तो ऐसी भावना है जो जन्म से लेके म्रत्यु तक हर
संस्कार में साकार होती ही रहती है |अब खुद को कट्टर कहने वाले लोगों को सोचने की जरुरत है की वे अपने चरित्र में राम को उतार पाएंगे भला ….क्योकि राम तो किसी बालि को दूसरों का हक़ छीनते हुए नहीं देख सकते |
राजधानियों के पास तो रामभूलकर  भी नहीं जाते , क्योकि वहाँ  इतनी तपन जो है ,,,,,राम तो पंचवटी की शीतलता ढूढते हैं …..जानते हो तुम्हारी द्रष्टि में धर्म का चरम सत्य इतना परिभाषित है कि उसकी परिधि में राम की प्रीति-प्रतीति
समा ही न सकेगी |

यहाँ राम के विचारों का कुछ मूल्य हो न हो , ठेकेदारों (नेताओं ,धार्मिक लोगों )ने इसे एक विषय बनाके अवश्य रख छोड़ा है | भारत में राम को मापा ही जाता रहता है, कभी राजनीति के पैमाने पर तो कभी धर्म के पैमाने पर, कभी रामजादे तो कभी हरामजादे |राम के ऐतहासिक चरित परिमापित किये जाने वाले, नित्यलीला के असली और जन-जन में अभिव्याप्त उदेश्य को भूलकर ऐतिहासिक लक्ष्यसिद्धियों में भटकने लगे |

Ram

हिन्दू धर्म एक जीवंत उच्छ्वास है और राम कोई पुरावृत नहीं है, वे हैं और वर्तमान ही रहेंगे | इतिहास में एक ऐसा समय भी आया जब रामा स्वामी नायकर के चेले कागज़ी राम पर चप्पले बरसाते हुए जुलूस निकालते हैं ,कई बार अस्तित्व पे प्रश्नचिन्ह भी लगे परन्तु राम कुछ चित्रों, कुछ मूर्तियों, कुछ स्मारकों व कृतियों तक ही तो सीमित नहीं जो उनका अपमान हो जाये | जिसके अन्दर भावना है वह राम का अपमान नहीं कर सकता और जिसके भीतर भावना नहीं उसके हाँथ में आएंगे बस कागज़ के चंद टुकड़े कुछ निर्जीव सी मूर्तियाँ और कुछ बिना जुबान की किताबें |

” राम कोई रचना नहीं, इतिहास नहीं, कल्पना नहीं, वह तो रचना की प्रक्रिया, कल्पना की छटपटाहट , और इतिहास की बदलती हुई व्यवस्था है |”

मैं कहती हूँ राम के भक्तों से अगर राम की पूजा करनी है तो, विचारों की पूजा क्यों नहीं मुर्तिमात्र की पूजा क्यों ,पर इस समय  मूर्ति मोह का खंडन करने वाला मुर्ख ही तो समझा जायेगा | सच्चा सनातन धर्म विगत के प्रति मोह नहीं रखता, वह तो आगत -अनागत से परे है |ये ज्योतिषियों से राशिफल देखने वालों, चंडी जपने वालों , चित्रों को दीवार पर टांग कर प्रदर्शनी करने वालो को राम कभी  समझ न आयेंगे क्योंकि राम तो ऐसी भावना है जो जन्म से लेके म्रत्यु तक हर संस्कार में साकार होती ही रहती है |अब खुद को कट्टर कहने वाले लोगों को सोचने की जरुरत है की वे अपने चरित्र में राम को उतार पाएंगे भला ….क्योकि राम तो किसी बालि को दूसरों का हक़ छीनते हुए नहीं देख सकते |

राजधानियों के पास तो रामभूलकर  भी नहीं जाते , क्योकि वहाँ  इतनी तपन जो है ,,,,,राम तो पंचवटी की शीतलता ढूढते हैं …..जानते हो तुम्हारी द्रष्टि में धर्म का चरम सत्य इतना परिभाषित है कि उसकी परिधि में राम की प्रीति-प्रतीति समा ही न सकेगी |



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